मेला

By Ruchi Malviya

मेला का कुछ अलग ही अपना मज़ा था. वो गोल  गप्पे, कुल्फी, रंग बिरंग चुडिया, गुड्डे गुडिया का खेल, नाचता बन्दर, भविष्य दिखने वाला  पोपट, बड़े बड़े झूले और चारो तरफ खुशिया ही खुशिया होती थी. वो समय ही बोहत अलग था. गाओ में लोग मेला का मज़ा कुछ एस लेते थे मनो कोई त्युहार मन रहे हो. छोटे बच्चे से लेकर दादा दादी तक इस मेला का लुत्फ़ उठाने आते थे. पूरा गाओ मनो एक परिवा की तरह इस मेला का हिस्सा बन  जाता  था.  क्या आपको याद है की आप आखरी बार कभ ऐसे किसी मेले का हिस्सा बने थे?

समय बदला ,समय के साथ इंसान और इंसान के साथ उसके  तोर  तरीके. आज मनोरंजन के सदन ही बदल गए है. एक समय था जभ ऐसे मेले गओ की रोनक होते थे और दिन ढलते ही सभ एक जुट होकर  मेले में मौज मस्ती करने जाते थे, दादा दादी में भी वो बचपना आ जाता था. पर आज हमे तो एक दुसरे से बात करने का भी समय नहीं है. ऐसे मेले की जगह अमुसेमेंट पार्क जैसे एस्सेल वोर्ल, वाटर किन्ग्दोम , अप्पू घर ने ले ली है.

पर मेले की सादगी, वो रोनक किसी भी अमुस्मेंट पार्क से बोहत ही अलग थी, अनोखी थी.आज घर लोटते समय यहाँ सभ यादें ताजा होगी जभ मैंने अपने घर के पास एक बोहत बाड़ा मेला देखा. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था की मुंबई जैसे शहर में जहा हमें अपने घर वालो से भी बात करना का समय नहीं मिलता है वह मेला देखकर में आशचर्यचकित हो गयी. वही बड़े बड़े झूले, बच्चो के हाथ में गुब्बारे और लोगो के चहरो पर वही ख़ुशी. मेले में बोहत भीड़ थी. कोई झुला का लुत्फ़ उठा रहा था तो कोई गोल गप्पे खा रहा था, कोई चुडिया खनका रहा था तो कोई शोर मचा रहा था.

मुंबई -सपनो की नगरी कही जाती है. लाखो लोग यहाँ रोसे अपने सपने पूरा करने आते है और फिर इस्सी भीड़ का हिस्सा बन जाते है. सभ अपनी ज़िन्दगी में इतने व्यस्त हो जाते है की फिर काम के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता है. यहाँ हर इंसान मशीन की तरह ज़िंदगी जी रहा है.  पर यह मेला देखने के बाद एक ही ख्याल मेरे मन में आया की, हम ज़िन्दगी में कितनी भी तरक्की कर ले पर कुछ चीज़े और यादें कभी नहीं बदलती और मोका पड़ने पर इंसान बोहत सरल और सौम्य हो जाता है. कहते है ओल्ड इस गोल्ड, सच ही कहा है. हमारी ज़िन्दगी अडवांस तोह हो गयी है पर शायद वो पुरानी चीजों और यादो की जगह कोई नहीं ले सकता है.

 

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